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मंगळवार, १८ सप्टेंबर, २०१८

शेरो-शायरी- संग्रहीत

गरीबों का घर लूटने वाले कभी अमीर नहीं होते,
निर्दोष निहत्थों पर वार करने वाले वीर नहीं होते,
जो सदियों से होता आया है मैं तो वही बात कहता हूँ
बुजुर्गों की दुआएँ बटोरने वाले कभी फकीर नही होते......!


इश्क़ ने गालिब निकम्मा कर दिया,
वरना हम भी आदमी थे; काम के...

चलो अच्छा हुआ काम आ गई दिवानगी अपनी
वरना हम जमानेभर को समजाने कहा जाते....
- गालिब

शुक्रवार, २३ मे, २०१४

शेरो-शायरी- संग्रहीत

तेरी पहचान भी न खो जाए कहीं |
इतने चेहरे ना बदल, थोड़ी सी शोहरत के लिए ||



फुरसत में करेंगें तुझसे हिसाब - ए - जिंदगी |

अभी उलझे है हम, खुद को ही सुलझाने में ||



कटी पतंग का रूख था, मेरे घर की तरफ.....

मगर उसे भी लूट ले गये, ऊँचे मकान वाले.....



हादसों से तुम अगर घबराओगे,

एक दिन खुद हादसा बन जाओगे...
जानते हो पत्थरो का शहर है, फिर 
किस गली से आईने ले जाओगे...
समझते रहते हो सबको अपना मगर ,
अपनी तन्हाई कहा ले जाओगे...



बहुत दूर है मेरे शहर से तेरे शहर का किनारा;

फिर भी हम हवा के हर झोंके से तेरा हाल पूछते है।



चढ़ जाए तो फिर उतरता ही नहीं कमबख्त |

यह इश्क भी गरीब के क़र्ज़ जैसा है ||



हर वक़्त जिंदगी से गिले शिकवे ठीक नहीं...

कभी तो छोड़ दो कश्ती इन मौजो के सहारे...



तेरी नेकी का लिबास ही 

तेरा बदन ढकेगा ऐ बंदे...
सुना है ऊपर वाले के घर 
कपड़ों की दुकान नहीं होती...



हर बात पे रंजिश, हर बात पे "हिसाब" जैसे 

हमने "इश्क" नहीं, "नौकरी" कर ली हो तेरी ||



कहने को तो "हमदर्दों" की कमी नही है |

और हर "दर्द" इन हमदर्दों की "हमदर्दी" है ||




चंद सिक्को में बिकता है यहाँ ईमान लोगो का | 

कौन कहता है मेरे देश मे महँगाई बहुत है ||



मोहब्बत आजमानी हो, तो बस इतना ही काफी है |

जरा सा रूठ कर देखो, मनाने कौन आता है ||




वक़्त भी लेता है करवटें न जाने क्या क्या ।

उम्र इतनी तो नहीं थी जितने सबक सीख लिए हमने...।।



मस्जिद तो हुई हासिल हमको,

खाली ईमान गंवा बैठे ।
मंदिर को बचाया लढ-भीडकर,
खाली भगवान गंवा बैठे ।
धरती को हमने नाप लिया,
हम चांद सितारों तक पहुंचे ।

कुल कायनात को जीत लिया,
खाली इन्सान गंवा बैठे ।
मजहब के ठेकेदारों ने आज फिर हमे युं भडकाया ।
के काजी और पंडित जिन्दा थे,
हम अपनी जान गंवा बैठे ।




मै न बदला, मगर जमाना बदल गया ।
जानी गलियों में , मकान पुराना बदल गया...।।




बुलंदियों की ख्वाइशें तो बहुत है मगर...
दूसरों को रौंदने का हुनर कहाँ से लायें ||





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सोमवार, ७ मे, २०१२

बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी

बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी
लोग बेवजह उदासी का सबब पूछेंगे
ये भी पूछेंगे के तुम इतनी परेशां क्यूँ हो 
उंगलियां उठेंगी सूखे हुए बालों की तरफ़
एक नज़र देखेंगे गुज़रे हुए सालों की तरफ़
चूड़ियों पर भी कई तंज़ किये जायेंगे
काँपते हाथों पे भी फ़िकरे कसे जायेंगे

बातों बातों में मेरा ज़िक्र भी ले आयेंगे
उनकी बातों का ज़रा सा भी असर मत लेना 
वरना चेहरे की तासुर से समझ जायेंगे
चाहे कुछ भी हो सवालात ना करना उनसे
मेरे बारे में कोई बात न करना उनसे
लोग ज़ालिम हैं हर एक बात का ताना देंगे
बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी
- कफील आजेर

गुरुवार, २२ मार्च, २०१२

अजनबी

अजनबी देश है यह, जी यहाँ घबराता है 
कोई आता है यहाँ पर न कोई जाता है 

जागिए तो यहाँ मिलती नहीं आहट कोई, 
नींद में जैसे कोई लौट-लौट जाता है 

शोर उठता है कहीं दूर क़ाफिलों का-सा
कोई सहमी हुई आवाज़ में बुलाता है

हम कहीं और चले जाते हैं अपनी धुन में
रास्ता है कि कहीं और चला जाता है

दिल को नासेह की ज़रूरत है न चारागर की
आप ही रोता है औ आप ही समझाता है ।

-सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
 

सोमवार, ५ मार्च, २०१२

नाम गुम जायेगा


नाम गुम जायेगा , चेहरा ये बदल जायेगा
मेरे अल्फाज ही पहचान है , अगर याद रहे..

वक्त के सितम कम हंसी नहीं , आज है यहां कल कहीं नहीं
वक्त के परे अगर मिल गए कहीं ,
मेरे अल्फाज ही पहचान है , अगर याद रहे..

जो गुजर गयी , कल की बात थी , उम्र तो नहीं एक रात थी
रात का सिरा अगर फिर मिले कहीं ,
मेरे अल्फाज ही पहचान है , अगर याद रहे..

दिन ढले जहां रात पास हो , जिंदगी की लौ उंची कर चलो
याद आए अगर कभी जी उदास हो ,
मेरे अल्फाज ही पहचान है , अगर याद रहे
..

-चित्रपट / Film: Kinaara
संगीतकार / Music Director:  राहुलदेव बर्मन-(R D Burman) 
गीतकार / Lyricist:  गुलजार-(Gulzar) 
गायक / Singer(s):  Bhupinder  ,   लता मंगेशकर-(Lata Mangeshkar) 

सोमवार, ३१ ऑक्टोबर, २०११

Phir Mohabbat - फिर मोहब्बत - Murder 2

जब जब तेरे पास मैं आया इक सुकून मिला
जिसे मैं था भूलता आया वो वजूद मिला
जब आए मौसम गम के तुझे याद किया
जब सहमे तन्हापन से तुझे याद किया
दिल संभल जा ज़रा फिर मोहब्बत करने चला है तू
दिल यहीं रुक जा ज़रा फिर मोहब्बत करने चला है तू
ऐसा क्यूँ कर हुआ जानू ना मैं जानू ना
दिल संभल जा ज़रा फिर मोहब्बत करने चला है तू
दिल यहीं रुक जा ज़रा फिर मोहब्बत करने चला है तू

जिस राह पे है घर तेरा अक्सर वहाँ से हाँ मैं हूँ गुज़रा
शायद यही दिल में रहा तू मुझको मिल जाए क्या पता
क्या है यह सिलसिला जानू ना मैं जानू ना
दिल संभल जा ज़रा फिर मोहब्बत करने चला है तू
दिल यहीं रुक जा ज़रा फिर मोहब्बत करने चला है तू

कुछ भी नही जब दरमियाँ फिर क्यूँ है दिल तेरे ही ख्वाब बुनता
चाहा की दे तुझको भुला पर यह भी मुमकिन हो ना सका
क्या है यह मामला जानू ना मैं जानू ना
दिल संभल जा ज़रा फिर मोहब्बत करने चला है तू
दिल यहीं रुक जा ज़रा फिर मोहब्बत करने चला है तू
दिल संभल जा ज़रा फिर मोहब्बत करने चला है तू

शुक्रवार, २६ ऑगस्ट, २०११

मुह की बात सुने हर कोई - निदा फाजली

मुह की बात सुने हर कोई, दिल के दर्द को जाने कौन
आवाजों के बाज़ारों में खामोशी पहचाने कौन

सदियों सदियों वही तमाशा, रास्ता रास्ता लम्बी खोज
लेकिन जब हम मिल जाते हैं, खो जाता है जाने कौन

वो मेरा आइना है या में उस की परछाई हूँ
मेरे ही घर में रहता है,मुझ जैसा ही जाने कौन

किरण किरण अलसाता सूरज, पलक पलक खुलती नींदें
धीमे धीमे पिघल रहा है, ज़र्रा-ज़र्रा जाने कौन 

मंगळवार, १९ ऑक्टोबर, २०१०

शेरो-शायरी- संग्रहीत

हमको खुशहाली में याराने अच्छे लगे,
जब जरा हालात बदले फासले अच्छे लगे,
यु ब जाहिर सब खफा थे उसकी हरकत पर,
पर जिस्म की उरयांनियो के जाविये अच्छे लगे,
बेशुमार आंखे कभी हम पे भी मंडराती रही,
उन दिनो की बात हैं जब आईने अच्छे लगे,
ये गझल युही अचानक चलते फिरते हो गयी,
सिर्फ मंजिल खलिल अच्छी लगी ऐसा नही,
हमसफर अच्छे मिले तो रास्ते अच्छे लगे...- Unknown.

मंजिल मूझे मिले या ना मिले
इसका गम नहीं,
मंजिल की जुस्तजू में
मेरा कारवां तो हैं - Unknown.

उनको देखने से चेहरे पे
आ जाती है रौनक,
वह समझते हैं
बिमार का हाल अच्छा है - Unknown.

अब हम समझे हमदर्दी का कडुवा है अंजाम बहुत
चलते फिरते लग जाते है यु दिलपर इल्जाम बहुत - साद अमरोही.